30 दिन जेल, फिर पद से छुट्टी: नया कानून या नया हथियार?

पिछले साल की घटना: जब दिल्ली के सीएम जेल गए…

साल 2024। देश की राजधानी दिल्ली। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को एक आपराधिक केस में हिरासत में लिया गया। देश भर में चर्चाएं तेज़ — क्या एक मुख्यमंत्री जेल से सरकार चला सकता है?

केजरीवाल ने तुरंत इस्तीफा नहीं दिया। जेल से छूटने के बाद पद छोड़ा, और आतिशी नई मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन इस पूरी घटना ने एक सवाल देश के सामने खड़ा किया:

👉 “क्या लोकतंत्र में, एक मुख्यमंत्री को जेल में रहते हुए पद पर बने रहना चाहिए?”


अब क्या करने जा रही है केंद्र सरकार?

अब, इसी बहस के जवाब में, केंद्र सरकार ने तीन अहम बिल लोकसभा में पेश किए हैं। इनका मकसद है:

कोई भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री अगर गंभीर अपराध में गिरफ़्तार होकर 30 दिन से ज्यादा जेल में रहता है — तो उसे पद से हटना पड़ेगा।

📜 तीन मुख्य बिल:

  1. संविधान संशोधन विधेयक (133वां अमेंडमेंट)
    • आर्टिकल 75 (केंद्र सरकार), 164 (राज्य सरकार), और 239AA (दिल्ली) में बदलाव।
  2. गवर्नमेंट ऑफ यूनियन टेरिटरीज़ अमेंडमेंट बिल 2025
  3. जम्मू कश्मीर रिऑर्गेनाइजेशन अमेंडमेंट बिल 2025

क्या है 30-Day Rule?

  • किसी मंत्री को अगर ऐसे अपराध में अरेस्ट किया गया है जिसमें 5 साल या उससे अधिक सजा का प्रावधान है, और अगर वो लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो:

31वें दिन वो व्यक्ति अपने पद से स्वतः हट जाएगा।

  • अगर उन्हें बेल मिल जाती है, तो वो वापस उसी पद पर लौट सकते हैं — अगर पार्टी चाहे।

लेकिन ये बदलाव क्यों ज़रूरी माना जा रहा है?

2013 में सुप्रीम कोर्ट के ‘Lily Thomas’ जजमेंट ने ये साफ किया था कि:

“अगर कोई सांसद या विधायक 2 साल या उससे ज्यादा की सज़ा पाए तो उसकी सदस्यता खत्म हो जाएगी।”

❗ लेकिन तब बात सज़ा के बाद की थी।
❗ नया कानून सिर्फ 30 दिन की हिरासत के आधार पर पद हटाने की बात करता है — भले ही कोर्ट ने अब तक सज़ा सुनाई न हो।


क्या इस बिल को पास करना आसान होगा?

नहीं।

संविधान संशोधन बिल के लिए चाहिए:

  • हाउस की टोटल मेंबरशिप का 50% समर्थन
  • और उपस्थित सदस्यों का 2/3 वोट

NDए के पास लोकसभा में बहुमत तो है, लेकिन 2/3 बहुमत नहीं है — यानी विपक्ष का साथ जरूरी है।

बाकी दो बिल केवल साधारण बहुमत से पास हो सकते हैं।


समर्थन और विरोध: दोनों पक्षों की बात

समर्थकों की दलीलें:

  • यह बदलाव कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी को बनाए रखेगा।
  • गंभीर आरोप में जेल में बैठे लोग सरकार न चलाएं, यह गुड गवर्नेंस का सवाल है।
  • दिल्ली में केजरीवाल केस में दिखा कि सरकार की कार्यप्रणाली ठप हो गई थी।

विरोधियों की दलीलें:

  • सरकार इसका राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकती है।
  • 30 दिन तक जेल में रखना तो जबरदस्ती भी किया जा सकता है
  • बिना कोर्ट की सज़ा के, किसी को पद से हटाना — संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

निष्कर्ष | क्या होगा आगे?

केंद्र सरकार के ये प्रस्ताव भारत के लोकतंत्र में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकते हैं।
एक ओर ज़रूरी है नैतिकता और पारदर्शिता बनाए रखना।
दूसरी ओर, लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग का डर भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।

अब सवाल यह है:

क्या संसद इस बिल को पारित करेगी? और अगर हां, तो क्या यह भारतीय राजनीति को अधिक जवाबदेह बनाएगा — या राजनीतिक प्रतिशोध का नया रास्ता खोलेगा?