अब इसे संयोग कहें या कांग्रेस की सोच का सच — एक बार फिर मंच पर माइक थामते ही पार्टी का असली चेहरा सामने आ गया।
बात एक हालिया जनसभा की है। कांग्रेस सांसद पप्पू यादव मंच पर चढ़े, जनता की ओर देखा और गर्व से बोले:
“अस्सलाम वालेकुम, जय भीम, नमो बुद्धाय…”
लेकिन जैसे ही माहौल में “जय श्री राम” गूंजने की उम्मीद जगी… वहाँ मौन छा गया।
अब सवाल उठता है:
जब देश की 80% आबादी राम को मानती है, उनके नाम से जीवन की शुरुआत करती है, तो “राम” का नाम लेने में हिचक क्यों?
क्या “जय श्री राम” बोलने से आपकी सेक्युलर छवि धुंधली हो जाएगी?
क्या इस डर से आप भगवान राम से भी किनारा कर लेंगे?
बात सिर्फ एक नारे की नहीं है…
यह एक सोच है — वो सोच जो बार-बार खुद को “धर्मनिरपेक्ष” बताने के चक्कर में हिंदू आस्था को ही नजरअंदाज कर देती है।
“जय भीम” और “नमो बुद्धाय” — ज़रूर कहिए। हर विचारधारा का सम्मान होना चाहिए।
लेकिन जब “जय श्री राम” कहने में सांस अटकने लगे, तो जनता भी पूछेगी — यह किससे डर है?
जनता अब भ्रम में नहीं है
कभी रामसेतु को काल्पनिक कह देना, कभी श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठाना, और अब राम नाम से ही कतराना —
जनता देख रही है कि कांग्रेस की राजनीति किस मोड़ पर खड़ी है।
“राम” कोई चुनावी मुद्दा नहीं…
राम तो संस्कार हैं, संस्कृति हैं, आत्मा हैं इस देश की।
जो पार्टी इस आत्मा से ही दूर हो जाए, क्या वो सच में देश की आवाज़ बन सकती है?
जहां “जय श्री राम” बोलने से डर लगे, वहाँ हिंदुओं को कांग्रेस की नीयत समझने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।