मीडिया की दोहरी नीति: क्यों हिंदू साधु-संतों को ही निशाना बनाना है आसान?

हाल ही में पत्रकार चित्रा त्रिपाठी के एक बयान को लेकर बहस छिड़ी है, जिसमें उन्होंने मुसलमान धर्मगुरुओं के खिलाफ कभी भी कोई कठोर टिप्पणी नहीं की। इस खबर का फोकस है, उस ‘दोहरी नीति’ पर जो भारतीय मीडिया में हिन्दू साधु-संतों और मुस्लिम धर्मगुरुओं के खिलाफ अपने दृष्टिकोण को लेकर देखने को मिलती है। क्या यह मीडिया की ओर से एक सशक्त हिंदू विरोधी दृषटिकोन है?

बात करें तथ्यों की:
चित्रा त्रिपाठी जी, जो आजकल पत्रकारिता के बड़े नामों में शुमार हैं, अक्सर अपने बयानों और रिपोर्ट्स में सक्रिय रहती हैं। लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या कोई पत्रकार मुस्लिम धर्मगुरु को “शैतान” कहने की हिम्मत जुटा सकता है? शायद नहीं, क्योंकि इसका सीधा असर STSJ (Scheduled Tribes and Scheduled Castes) और अन्य धार्मिक एवं राजनीतिक समूहों पर पड़ेगा। वहीं, हिन्दू साधु संतों के खिलाफ अक्सर ऐसे बयान आए दिन मीडिया में सुनने को मिलते हैं।

मीडिया की एकतरफा जाँच:
यह भी देखना अहम है कि ऐसे मामलों में हिंदू संतों को हमेशा निशाना क्यों बनाया जाता है, जबकि मुस्लिम धर्मगुरु अक्सर आलोचनाओं से बच जाते हैं। क्या यह दोहरे मापदंड को दर्शाता है? मीडिया ने हमेशा से हिंदू संतों और महात्माओं पर कड़े हमले किए हैं, जबकि वे कभी भी मुस्लिम धर्मगुरुओं की आलोचना नहीं करते।

मीडिया पर आरोप:
इसका सीधा आरोप है कि भारतीय मीडिया एक ‘विकलांग’ स्थिति में है, जो धर्म, जाति और समाज के अनुसार अलग-अलग नियम लागू करती है। हिन्दू संतों पर आरोप लगाने के बजाय मुस्लिम धर्मगुरुओं को न केवल पूरी तरह से बचा लिया जाता है, बल्कि उनके कृत्यों को ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ के तहत सही ठहराया जाता है।

समाज में सांप्रदायिक तनाव:
इस प्रकार की रिपोर्टिंग से समाज में सांप्रदायिक तनाव बढ़ता है। मीडिया को यह समझने की आवश्यकता है कि किसी भी धर्म या समुदाय के खिलाफ भ्रामक या नफरत भरे शब्दों का उपयोग न केवल उनके अनुयायियों के बीच असंतोष फैलाता है, बल्कि यह देश में शांति और सद्भावना को भी नुकसान पहुंचाता है।


चित्रा त्रिपाठी के बयान से यह बात स्पष्ट होती है कि भारतीय मीडिया की तरफ से दोहरे मानदंड अपनाए जाते हैं, जिनके परिणामस्वरूप हिंदू संतों को हमेशा कठघरे में खड़ा किया जाता है, जबकि मुस्लिम धर्मगुरु अक्सर इससे बच निकलते हैं। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी का सही निर्वाह करना चाहिए और किसी भी धर्म या समुदाय के खिलाफ भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपनाना चाहिए।