आज के समय में बालों का सफेद होना सिर्फ बढ़ती उम्र तक सीमित नहीं रहा, कम उम्र के युवाओं में भी ग्रे और सफेद बाल तेजी से नजर आने लगे हैं, बदलती जीवनशैली और बढ़ता तनाव इस समस्या को गंभीर बना रहे हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार बालों का रंग एक प्राकृतिक पिगमेंट मेलानिन से तय होता है, यही पिगमेंट यह निर्धारित करता है कि किसी व्यक्ति के बाल काले, भूरे या हल्के रंग के होंगे।
यह मेलानिन बालों की जड़ों में मौजूद विशेष कोशिकाओं द्वारा बनाया जाता है, जब तक ये कोशिकाएं सक्रिय रहती हैं तब तक बालों का प्राकृतिक रंग बना रहता है, लेकिन समय के साथ इनकी कार्यक्षमता कम होने लगती है।
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, मेलानिन बनाने वाली कोशिकाएं कमजोर हो जाती हैं और पिगमेंट का उत्पादन घटने लगता है, इसका सीधा असर बालों के रंग पर पड़ता है और वे धीरे-धीरे सफेद या ग्रे दिखाई देने लगते हैं।
इस प्रक्रिया को विज्ञान में सेल्युलर एजिंग कहा जाता है, यानी शरीर की कोशिकाएं समय के साथ अपनी क्षमता खोने लगती हैं, शुरुआत में कुछ ही बाल सफेद होते हैं लेकिन धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ जाती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जेनेटिक्स यानी आनुवंशिक कारण भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं, अगर परिवार में कम उम्र में बाल सफेद होने का इतिहास रहा है तो अगली पीढ़ी में भी इसकी संभावना ज्यादा होती है।
पोषण की कमी को भी बालों के समय से पहले सफेद होने का बड़ा कारण माना जाता है, विटामिन बी12, आयरन, कॉपर और प्रोटीन की कमी से पिगमेंट बनाने वाली कोशिकाएं प्रभावित होती हैं।
डॉक्टर संतुलित आहार पर जोर देते हैं, जिसमें हरी सब्जियां, फल, दालें, नट्स और डेयरी उत्पाद शामिल हों, ताकि बालों की जड़ों तक जरूरी पोषण पहुंच सके।
लंबे समय तक बना रहने वाला मानसिक तनाव भी बालों के रंग पर असर डालता है, तनाव के कारण हार्मोनल असंतुलन होता है जो मेलानिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार गलत जीवनशैली जैसे कम नींद, धूम्रपान, अत्यधिक शराब सेवन और फास्ट फूड पर निर्भरता ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाती है, जिससे कोशिकाएं जल्दी बूढ़ी होती हैं और बाल समय से पहले सफेद होने लगते हैं।
