“Public Trust पर सवाल: क्यों दब जाती है हिंदुत्व की आवाज़?”

गुरुग्राम से कोलकाता पुलिस 18-19 साल की शर्मिष्ठा पनोली को गिरफ्तार करके ले गई। गिरफ्तारी का आधार था ऑपरेशन सिंदूर के संबंध में उनके द्वारा पोस्ट किया गया एक वीडियो। पुलिस की गाड़ी में बैठते हुए उसने मीडिया की ओर देखा और कहा—“डेमोक्रेसी।” यह शब्द उस पल में एक पुकार की तरह था, लेकिन वहाँ मौजूद पत्रकारों ने उसकी गंभीरता को समझने के बजाय मजाक बना दिया। यही पहला झटका था, जब लोकतंत्र का चेहरा आईने की तरह साफ नज़र आया।

आम लोगों को ऐसा महसूस हुआ कि आज का सिस्टम तुरंत सक्रिय होता है जब बात एक खास समुदाय की आती है, लेकिन जब कोई हिंदू अपनी आवाज़ उठाता है तो उसकी पुकार अक्सर अनसुनी रह जाती है।

यही पैटर्न बाकी जगहों पर भी दिखता है। अगर कोई अल्लाह के खिलाफ बोल दे तो पुलिस तुरंत एक्शन ले लेती है, लेकिन अगर हिंदू देवी-देवताओं या भारत माता का अपमान हो तो उसे “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” कहकर टाल दिया जाता है। हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे की एक युवती को राहत दी, जिस पर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने और हिंदुत्व को आतंकवाद कहने का आरोप था। अदालत की तत्परता ऐसे मामलों में साफ दिखाई देती है, लेकिन जब बारी शर्मिष्ठा जैसी युवतियों की आती है, तो वही संवेदनशीलता गायब हो जाती है।

अर्नब गोस्वामी का मामला भी याद दिलाता है कि व्यवस्था का भार किस तरह खास लोगों पर ही पड़ता है। उन्हें आठ दिन जेल में रहना पड़ा और तभी जाकर सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी। ऐसे उदाहरण यह धारणा और मजबूत करते हैं कि न्याय का तराजू सभी के लिए बराबर नहीं है।

आम लोग स्वाभाविक रूप से सरकार या प्रधानमंत्री से सुरक्षा और न्याय की उम्मीद करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सरकार की भी सीमाएँ होती हैं। न्यायपालिका और प्रशासन का बड़ा हिस्सा अक्सर हिंदुत्व की आवाज़ को दबाने वाली सोच से प्रभावित रहता है। इसलिए यह सोचना गलत है कि सरकार हर समय व्यक्तिगत स्तर पर किसी की रक्षा कर पाएगी।समस्या यह भी है कि सरकारें कई बार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरतीं। सत्ता में रहते हुए वे बड़े-बड़े वादे करती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत में साधारण नागरिक को सुरक्षा और न्याय देने की बजाय राजनीतिक गणनाओं को प्राथमिकता दी जाती है।

इसीलिए यह समझना ज़रूरी है कि हिंदुत्व या राष्ट्र के लिए बोलना किसी राजनीतिक दल या नेता के लिए नहीं होना चाहिए। यह अपने समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए होना चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि नागरिक अपने भविष्य की रक्षा के लिए सजग और जिम्मेदार बनें।

आज का संघर्ष सिर्फ सत्ता तक सीमित नहीं है। असली लड़ाई अभी जारी है और यह लंबी है। दुश्मन ताकतवर और चालाक है, इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाना होगा। बिना रणनीति और तैयारी के उत्साह में बहना आत्मघात साबित हो सकता है। यही वजह है कि हमें सतर्क भी रहना है और धैर्य भी रखना है।


शर्मिष्ठा की गिरफ्तारी केवल एक घटना नहीं बल्कि इस बात का प्रतीक है कि लोकतंत्र और न्याय का तराजू सभी के लिए बराबर नहीं है। व्यवस्था अक्सर हिंदुत्व की आवाज़ को दबाने में सख़्त दिखाई देती है, जबकि दूसरी ओर “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का सहारा लेकर कुछ और मामलों को आसानी से नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। लेख का निष्कर्ष यही है कि हिंदू समाज को यह समझना होगा कि असली संघर्ष अभी बाकी है और अपनी आस्था व भविष्य की रक्षा के लिए उसे धैर्य, रणनीति और सजगता के साथ खड़ा होना होगा।