नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पराक्रम को नमन

देश आज पराक्रम दिवस के अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अदम्य साहस, त्याग और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को नमन कर रहा है। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए एक दिल और एक प्राण होकर कटिबद्ध होने की जो आह्वान नेताजी ने किया था, उसने ब्रिटिश शासन को हिला दिया था।

23 जनवरी 1897 को कटक में जन्मे नेताजी का व्यक्तित्व इतना विराट था कि उन्हें पूरे देश ने अपना नेता माना। देश और विदेश में रह रहे भारतीयों में उन्होंने स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्वलित की और कहा कि आजादी की जिम्मेदारी हर भारतीय की है, चाहे वह कहीं भी रह रहा हो।

सुभाष चंद्र बोस ने 1921 में भारतीय सिविल सेवा से इस्तीफा देकर स्वतंत्रता के संघर्ष में पूर्ण समर्पण का मार्ग चुना। उनका विश्वास था कि राष्ट्र का निर्माण त्याग और कष्ट की भूमि पर ही हो सकता है।

नेताजी हिंदू विचारधारा से भी गहराई से प्रभावित थे, वे हमेशा अपनी वर्दी की जेब में भगवत गीता रखते थे और रात में ध्यान करते थे। उनके लिए उपनिषदों का त्याग ही देश सेवा का मार्ग था।

इतिहास का वह निर्णायक क्षण 21 अक्टूबर 1943 था, जब उन्होंने सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार की स्थापना की और स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्राध्यक्ष बने। चीन, जर्मनी, जापान, कोरिया और इटली सहित कई देशों ने इस सरकार को मान्यता दी, जिससे आजादी की लड़ाई को वैश्विक मंच पर बल मिला।

आजाद हिंद फौज के वीर सैनिकों ने ब्रिटिश सरकार को कई मोर्चों पर चुनौती दी और देश के बड़े भूभाग को स्वतंत्र कराया। लाल किला ट्रायल ने देश में व्यापक राष्ट्रवाद की लहर पैदा की और ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।

आज पराक्रम दिवस नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज के वीर सेनानियों के बलिदान, देशभक्ति और संकल्प का स्मरण कराने का दिन है। देश आज भी उनके विचारों और पराक्रम से प्रेरणा लेता है।