"Rabindranath Tagore on Moplah Massacre 1921 and Hindu society"

Moplah Massacre 1921 पर टैगोर के विचार, जो आज भी प्रासंगिक हैं”

रवींद्रनाथ टैगोर को अक्सर सिर्फ कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उन्होंने समाज और धर्म पर भी गहरी बातें कही थीं। दुर्भाग्य यह है कि आज़ादी के बाद उनकी कई सच्चाइयाँ हमसे छिपा दी गईं।

Moplah Massacre 1921 उस समय की सबसे भयावह सांप्रदायिक हिंसा थी। इस पर सावरकर, अंबेडकर और एनी बेसेंट जैसे नेताओं ने खुलकर प्रतिक्रिया दी। रवींद्रनाथ टैगोर ने भी इस घटना पर लिखा और खासतौर से हिंदुओं की मनोस्थिति पर चिंता जताई। उनका कहना था कि मालाबार के हिंदू स्वभाव से विनम्र और शांतिप्रिय हैं, लेकिन मोपला मुसलमानों के डर से वे संकट आते ही अपनी स्त्रियों और बच्चों को लेकर भागने लगते हैं। टैगोर के अनुसार यह प्रवृत्ति गलत है, क्योंकि आत्मरक्षा छोड़कर केवल ईश्वर से दंड की उम्मीद करना आस्था नहीं, बल्कि कायरता और ईश्वर का अपमान है।

टैगोर ने इतिहास की एक बड़ी गलती भी याद दिलाई। उन्होंने लिखा कि सदियों पहले जब हिंदू राजा ने अरब व्यापारियों को बसने और धर्मांतरण की अनुमति दी, उसी का नतीजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ा। उनके शब्दों में, “मूर्खता का परिणाम है कि हिंदू आपस में बंट गए और गुलाम बन गए। लेकिन अगर हम अपनी मूर्खता छोड़ दें तो अत्याचारी खुद आत्मसमर्पण कर देगा।”

उन्होंने हिंदू समाज की बिखरी हुई स्थिति को भी कटाक्ष के साथ बताया। टैगोर ने लिखा, “अल्लाहु अकबर की अपील पर मुसलमान एकजुट हो सकते हैं। लेकिन जब हम कहते हैं—आओ हिंदुओ, तो शायद कोई उत्तर ही न दे।”

यहीं नहीं, टैगोर ने ईसाई और इस्लाम दोनों पर टिप्पणी की। विश्वभारती से प्रकाशित उनके लेखन में दर्ज है कि ये दोनों मजहब केवल अपने पालन से संतुष्ट नहीं होते, बल्कि दूसरों को नष्ट करने के लिए उतावले रहते हैं। उनके अनुसार इनके साथ शांति का सिर्फ एक रास्ता है—उनका मजहब अपना लेना, वे दूसरा विकल्प नहीं देते।

1924 में टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में टैगोर ने कहा था कि हिंदू-मुस्लिम एकता की सबसे बड़ी बाधा यह है कि मुसलमान अपनी निष्ठा किसी एक देश तक सीमित नहीं रख सकते। टैगोर ने कई मुसलमानों से पूछा कि अगर किसी मुस्लिम शक्ति ने भारत पर हमला किया तो क्या वे हिंदुओं के साथ मिलकर मातृभूमि की रक्षा करेंगे? जो जवाब मिले, वे संतोषजनक नहीं थे।

टैगोर ने यह भी चेतावनी दी कि खतरा सिर्फ धार्मिक कट्टरता से नहीं है, बल्कि वामपंथी विचारधारा से भी है। उनके अनुसार मजहबी कट्टरता हो या बोल्शेविज़्म—दोनों की जड़ एक ही है: जो उनसे असहमत हो, उसे मिटा देना। टैगोर मानते थे कि इस तरह की संकीर्ण और विनाशकारी सोच का मुकाबला केवल हिंदू धर्म कर सकता है, क्योंकि हिंदू परंपरा स्वभाव से सहिष्णु और विविध विचारों को स्वीकार करने वाली है।

टैगोर की ये बातें उस दौर में कही गई थीं जब इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने की हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पाते थे। आज सवाल यह है कि अगर इन विचारों को स्वतंत्रता के बाद ईमानदारी से समाज तक पहुँचाया गया होता तो क्या भारत आज ज़्यादा मज़बूत और एकजुट होता?