लालच का अंत –
दोस्तों, कहते हैं इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी उसका लालच है। लालच धीरे-धीरे इंसान की आंखों पर पर्दा डाल देता है और सच को देखना मुश्किल बना देता है। आज की कहानी इसी सच्चाई को उजागर करती है।
गांव और किरदार
एक सुंदर गांव था, जहां लोग खुशहाल जीवन जी रहे थे।
धनराज – अमीर जमींदार, पर लालच और अभिमान से भरा हुआ।
गोपाला – गरीब किसान, पर मेहनती और ईमानदार। गांव वाले उसकी ईमानदारी की खूब तारीफ करते।
धनराज को हमेशा गोपाला से जलन होती।
पहली जाल
गोपाला की मेहनत से खेत में सोने जैसी फसल हुई। गांव वाले उसकी तारीफ करते –
“देखो मेहनत का फल कैसे चमक रहा है!”
धनराज ईर्ष्या से भरकर बोला –
“गोपाला, यह खेत मुझे बेच दे। तुझे अच्छा दाम मिलेगा।”
गोपाला ने साफ मना कर दिया –
“यह खेत मेरे पिता की निशानी है, मैं इसे कभी नहीं बेचूंगा।”
धोखा और अन्याय
धनराज ने पंचायत में झूठा दावा किया कि यह खेत उसके पूर्वजों का है। रिश्वत देकर कुछ लोगों को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया। पंचायत ने बिना सबूत गोपाला को खेत से निकाल दिया।
गोपाला की मां ने आंसू भरी आंखों से कहा –
“बेटा, दुख मत कर। सच का सूरज देर से निकलता है मगर हमेशा चमकता है।”
लालच का असर
धनराज ने खेत पर कब्जा कर लिया। पहले साल बहुत फायदा हुआ। वह अकड़कर बोला –
“पैसा और ताकत ही असली भगवान है।”
लेकिन धीरे-धीरे हालात बदल गए।
बारिश कम हुई, फसल सूख गई।
गोदाम का अनाज खराब हो गया।
मजदूर भी छोड़कर चले गए।
गांव वाले फुसफुसाने लगे –
“ईश्वर का न्याय शुरू हो गया है।”
बर्बादी का दौर
धनराज और लालची हो गया, और भी जमीन हड़पने लगा। पर हर बार घाटा ही हुआ। एक दिन उसके गोदाम में आग लग गई और सब राख हो गया। घर के लोग भी बीमार पड़ने लगे।
गांव वाले कहने लगे –
“लालच ने धनराज को अंधा बना दिया। यही उसका असली अंत है।”
पछतावा और बदलाव
भूखा-प्यासा धनराज गांव वालों से मदद मांगता है, पर सब मना कर देते हैं।
आखिरकार, गोपाला ही उसे खाना-पानी देता है।
धनराज भावुक होकर कहता है –
“मैंने तेरा हक छीना, तुझे अपमानित किया, फिर भी तूने मेरी मदद की। सच है – लालच का अंत बर्बादी ही है।”
गोपाला मुस्कुराकर बोला –
“धन से बड़ा कोई खजाना नहीं होता, इंसानियत सबसे बड़ी दौलत है।”
नई शुरुआत
धनराज ने पंचायत के सामने अपनी गलती मानी और गांव वालों से माफी मांगी। गांव वालों ने शर्त रखी कि अब वह गरीबों की मदद करेगा।
धनराज बदल गया और सेवा-भाव से जीने लगा। अब गांव के बच्चे कहते –
“लालच नहीं, दया ही धनराज की पहचान है।”
सीख
दोस्तों, यह कहानी हमें यही सिखाती है –
लालच इंसान से सब कुछ छीन लेता है।
संतोष और इंसानियत ही असली दौलत है।
लालच का अंत हमेशा पछतावा और बर्बादी से होता है,
जबकि इंसानियत अमर रहती है।