1966 का भूला हुआ नरसंहार: जब साधु-संतों पर बरसीं गोलियां



संसद मार्ग का रक्तरंजित दिन

7 नवंबर 1966, संसद भवन का नजारा भारतीय इतिहास में लगभग गुम कर दिया गया। उस दिन करीब एक लाख साधु-संत और गौ रक्षक संसद भवन के बाहर जुटे थे। नगाड़ों और शंख की गूंज के बीच सिर्फ एक मांग थी—गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध।

इंदिरा गांधी सरकार दबाव में थी। संसद के चारों ओर भारी पुलिस बल तैनात था। दोपहर होते-होते माहौल बदल गया। बैरिकेड टूटे और अचानक लाठीचार्ज हुआ। कुछ ही देर बाद गोलियां चलाई गईं। कई साधु वहीं ढेर हो गए। हजारों लोगों को बसों में भरकर रातोंरात दिल्ली से बाहर कर दिया गया।

अगले दिन अखबारों में छपा—सिर्फ 8 या 11 मौतें। लेकिन चश्मदीद गवाहों और हिंदू संगठनों का दावा था कि हजारों साधु-संत मारे गए और उनकी लाशें सरकारी ट्रकों में भरकर गुपचुप जला दी गईं।


संघर्ष की पृष्ठभूमि

  • 1947: संविधान सभा में हिंदू नेताओं ने गौ हत्या पर प्रतिबंध की मांग रखी।
  • नेहरू का विरोध: जवाहरलाल नेहरू ने साफ कहा—भारत धर्मनिरपेक्ष है, धार्मिक आधार पर कानून नहीं बनेगा।
  • 1955: जब यह मुद्दा फिर उठा तो नेहरू ने धमकी दी—अगर बिल पास हुआ तो मैं प्रधानमंत्री पद छोड़ दूंगा।
  • 1964: नेहरू की मृत्यु के बाद साधु समाज ने आंदोलन तेज किया। इंदिरा गांधी ने वादा किया कि 1967 में कांग्रेस जीती तो गौ हत्या पर रोक लगेगी।

लेकिन वादा पूरा नहीं हुआ।


वाशिम से दिल्ली तक

1966 में महाराष्ट्र के वाशिम में शांतिपूर्ण मार्च पर पुलिस फायरिंग हुई, कई मारे गए। यहीं से आंदोलन भड़क उठा। और फिर 7 नवंबर को साधु-संतों का ऐतिहासिक प्रदर्शन दिल्ली में हुआ।


संसद मार्ग पर खून

संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी और अन्य नेताओं की अगुवाई में यह सभा शांतिपूर्ण थी। नागा साधुओं के पास शस्त्र अवश्य थे, लेकिन प्रदर्शन आक्रामक नहीं था। इसी दौरान पुलिस ने आंसू गैस, लाठियां और फिर गोलियां चलाईं।

राम मंदिर आंदोलन से जुड़े चंपत राय ने खुद गवाही दी कि उस समय अटल बिहारी वाजपेयी सभा को संबोधित कर रहे थे। गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया।

पत्रकार मनमोहन शर्मा ने लिखा कि “लाशें सड़कों पर पड़ी थीं, खून बह रहा था, लेकिन सरकार ने प्रेस को मजबूर किया कि वही छापो जो प्रेस नोट में लिखा हो।”


श्राप और विडंबना

स्वामी करपात्री महाराज ने इंदिरा गांधी से कहा था—“दुख इस बात का नहीं कि तूने साधुओं की हत्या कराई, दुख इस बात का है कि तूने गौ हत्यारों को छूट दी। इसका पाप तुझे लगेगा। गोपाष्टमी के दिन ही तेरा नाश होगा।”

31 अक्टूबर 1984, जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई, वह दिन वास्तव में गोपाष्टमी ही था।


इतिहास की चुप्पी

यह पूरा अध्याय आज भी स्कूल की किताबों से गायब है। आधिकारिक रिकॉर्ड मौन हैं। लेकिन सवाल आज भी जिंदा है—

  • अगर यह सिर्फ एक प्रदर्शन था तो हजारों लाशें कहां गईं?
  • प्रेस को क्यों दबाया गया?
  • और सरकार ने इस नरसंहार को छुपाने की ज़रूरत क्यों महसूस की?

यह घटना हिंदुस्तान की राजनीति और लोकतंत्र पर ऐसी चोट है, जिसे भुला दिया गया, लेकिन मिटाया नहीं जा सका।