गुजरात के जामनगर में स्थित वनतारा वाइल्डलाइफ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर अब राष्ट्रीय स्तर पर जांच के दायरे में है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस विवादित परियोजना की जांच के लिए विशेष जांच टीम (SIT) का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त जज जस्ती चेलमेश्वर करेंगे।
जांच के दायरे में क्या है?
- हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों की अवैध खरीद
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 का संभावित उल्लंघन
- मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अनियमितताएं
- अंतरराष्ट्रीय तस्करी से संबंधित कड़ियाँ
सेंटर का संचालन रिलायंस फाउंडेशन द्वारा किया जा रहा है, जिसे अनंत अंबानी ने स्थापित किया है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कई जानवर बिना उचित दस्तावेज़ों और प्रक्रिया के लाए गए हैं।
कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
“यह केवल एक निजी परियोजना की बात नहीं है, बल्कि पूरे देश के वन्यजीव कानूनों और नैतिक संरक्षण दायित्वों का सवाल है।”
अदालत ने SIT को आदेश दिया है कि वह 12 सितंबर 2025 तक अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट दाखिल करे।
वन्यजीवों की भलाई या कॉर्पोरेट शो?
यह प्रकरण केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और पारिस्थितिकी संतुलन का भी है। विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने सवाल उठाए हैं:
- क्या जानवरों को प्राकृतिक आवास से अलग कर शो-पीस बना दिया गया है?
- क्या “बचाव और पुनर्वास” के नाम पर असल में कॉर्पोरेट पावर का प्रदर्शन हो रहा है?
रिलायंस फाउंडेशन ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि वनतारा एक संरक्षण मिशन है, जिसका लक्ष्य संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा करना है।
आने वाले दिन अहम
SIT को अपनी रिपोर्ट में निम्नलिखित पहलुओं की जाँच करनी है:
- जानवरों की खरीद-फरोख्त की वैधता
- वित्तीय लेनदेन की पारदर्शिता
- विदेशी और भारतीय वन्यजीव कानूनों के पालन की स्थिति
- संस्थान द्वारा लिए गए सभी सरकारी परमिट और अनुमति की समीक्षा
वनतारा केस सिर्फ एक सेंटर की जांच नहीं है, बल्कि यह परीक्षण है कि भारत की न्यायपालिका और पर्यावरण नीति कॉर्पोरेट ताकतों के सामने कितनी निष्पक्ष और संवेदनशील है। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती यह संकेत देती है कि अब वन्यजीव संरक्षण सिर्फ बयानबाज़ी का विषय नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक जवाबदेही का विषय बन चुका है।