आतंकवाद और मोबोट: एक खतरनाक मानसिकता

हॉलीवुड की मशहूर फिल्म टर्मिनेटर आपने देखी होगी। उसमें एक मोबोट को प्रोग्राम किया गया था कि वो एक लड़की को मारे। लेकिन पता न मिलने पर उसने उस नाम की हर लड़की को ढूंढ-ढूंढकर खत्म करना शुरू कर दिया। चाहे उसका हाथ कट जाए या पैर टूट जाए, वो खुद को जोड़कर फिर उठ खड़ा होता।

यह दृश्य भले फिल्मी हो, लेकिन असलियत में भी कुछ दिमाग ऐसे ही चलते हैं। आतंकवादी सोच भी उसी मोबोट की तरह है.जिसे हिंसा ही अपनी पहचान और “धर्म” लगती है। यह मानसिकता न थकती है, न रुकती है। और नतीजा होता है.एक ऐसा युद्ध, जिसमें इंसानियत ही कुचली जाती है।

हथियार से नहीं, भीतर से जवाब

समस्या सिर्फ बाहरी नहीं है। असली इलाज भीतर की दुनिया में है। ध्यान, साधना और आध्यात्मिकता ही इस सोच का सबसे बड़ा जवाब है। भगवान राम और कृष्ण ने भी यही दिखाया—धर्म की रक्षा करनी है तो शांति और न्याय के रास्ते से ही करनी होगी।

इतिहास की सीख

हमारे इतिहास में भी कई मिसालें हैं।

  • महाराणा प्रताप ने कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान और संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी।
  • शिवाजी महाराज ने जनता और धर्म के लिए संघर्ष किया, लेकिन कभी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया।
  • सिख गुरुओं ने सिखाया कि लड़ाई ज़रूरी है, लेकिन वह सत्य और आध्यात्मिकता पर आधारित होनी चाहिए।

ये कहानियाँ सिर्फ अतीत नहीं हैं, बल्कि आज भी हमें रास्ता दिखाती हैं।

आगे का रास्ता

अगर समाज को बदलना है तो शुरुआत यहीं से होगी—

  • बच्चों और युवाओं को सिखाना कि हिंसा से कुछ हल नहीं होता।
  • इंसानियत और सहिष्णुता को ताक़त मानना।
  • शिक्षा, रोज़गार और बराबरी के मौके बढ़ाना।
  • और हर नागरिक को यह भरोसा दिलाना कि वो सुरक्षित है।

आज सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ आतंकवाद नहीं, बल्कि वो सोच है जो इसे सही ठहराती है। हमें उस “प्रोग्राम” को बदलना होगा। और यह तभी होगा जब हम भीतर की शांति और दया को जागृत करेंगे।

जब हर इंसान अपने भीतर की ताक़त पहचानेगा, तभी नया दौर शुरू होगा—जहाँ हिंसा नहीं, बल्कि प्रेम और शांति राज करेगी।