“अधर्म पर धर्म की विजय – श्री वराह जयंती विशेष”

धर्म और इतिहास से जुड़ा पर्व
भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को भगवान विष्णु के तीसरे अवतार श्री वराह अवतार की जयंती मनाई जाती है। इस दिन को श्री वराह जयंती कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जब हिरण्याक्ष नामक असुर ने पृथ्वी को पाताल लोक में ले जाकर समुद्र में छिपा दिया था, तब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर धरती को अपने दांतों पर उठाकर पुनः आकाश मंडल में स्थापित किया।

वराह अवतार की महिमा
भगवान विष्णु का यह अवतार धर्म की रक्षा और असुरों के नाश के लिए हुआ। पुराणों में वर्णन मिलता है कि वराह रूप धारण कर उन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया और ब्रह्मांड की रक्षा की। यह अवतार इस संदेश का प्रतीक है कि धर्म और सत्य को कभी दबाया नहीं जा सकता, चाहे अधर्म कितना भी बलशाली क्यों न हो।

शास्त्रों में वर्णन
श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और अन्य ग्रंथों में वराह अवतार का विस्तृत वर्णन मिलता है। संस्कृत श्लोक में भगवान वराह की स्तुति इस प्रकार की गई है –

“नमस्तस्मै वराहाय लीलायद्धरतें महीम्।
खुरमध्यगतों यस्य मेरुः खणखणायते॥”

अर्थात – उस वराह भगवान को नमन है, जिन्होंने लीला से पृथ्वी को धारण किया और जिनके खुर के मध्य मेरु पर्वत भी झंकार करने लगे।

पूजा और परंपराएँ
श्री वराह जयंती के अवसर पर भक्तजन भगवान विष्णु और वराह अवतार की पूजा करते हैं। व्रत, कथा, हवन और सत्संग का आयोजन होता है। विशेष रूप से इस दिन पृथ्वी माता की पूजा का भी महत्व है।

आध्यात्मिक संदेश
श्री वराह जयंती हमें यह सिखाती है कि जब भी अधर्म और अराजकता बढ़ती है, तो ईश्वर किसी न किसी रूप में प्रकट होकर धर्म की स्थापना करते हैं। यह पर्व धर्म की रक्षा, न्याय और सत्य की विजय का प्रेरणास्रोत है।

👉 “श्री वराह जयंती की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।”